
समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव ने उन्हें दी गई NSG (नेशनल सिक्योरिटी गार्ड) सुरक्षा हटाए जाने के केंद्र सरकार के फैसले पर कड़ी आपत्ति जताते हुए इसे भाजपा की एक सोची-समझी “राजनीतिक साजिश” करार दिया है। लखनऊ में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित करते हुए अखिलेश ने आरोप लगाया कि सरकार विपक्षी नेताओं का मनोबल गिराने और उन्हें असुरक्षित महसूस कराने के लिए सुरक्षा प्रोटोकॉल का राजनीतिकरण कर रही है। उन्होंने सवाल उठाया कि जब उनके जीवन पर मंडराने वाले खतरों का आकलन अभी भी गंभीर है, तो अचानक बिना किसी स्पष्टीकरण के ‘ब्लैक कैट’ कमांडो का घेरा क्यों वापस ले लिया गया। अखिलेश ने इसे केवल अपनी सुरक्षा में कटौती नहीं, बल्कि विपक्ष की आवाज को दबाने का एक प्रयास बताया है।
अखिलेश यादव ने इस घटनाक्रम की तुलना कांग्रेस नेता राहुल गांधी की ‘एसपीजी’ (SPG) सुरक्षा हटाए जाने से करते हुए कहा कि भाजपा चुनिंदा तरीके से विपक्षी चेहरों को निशाना बना रही है। उन्होंने व्यंग्य करते हुए कहा कि सरकार को यह सार्वजनिक करना चाहिए कि उनकी सुरक्षा समीक्षा में कौन से नए तथ्य सामने आए हैं, जिसके आधार पर यह निर्णय लिया गया। सपा प्रमुख का तर्क है कि एक पूर्व मुख्यमंत्री के रूप में जो सुरक्षा मानक निर्धारित हैं, उनके साथ खिलवाड़ करना लोकतंत्र के लिए खतरनाक संकेत है। उन्होंने चेतावनी दी कि भले ही सरकार उनसे सुरक्षा कवच छीन ले, लेकिन वे जनता के बीच जाना बंद नहीं करेंगे और भाजपा की इन “डराने वाली चालों” का सामना मजबूती से करेंगे।
भाजपा ने अखिलेश के इन आरोपों को “हताशा की राजनीति” बताते हुए खारिज कर दिया है और स्पष्ट किया है कि सुरक्षा का निर्धारण राजनीतिक आधार पर नहीं, बल्कि सुरक्षा एजेंसियों की ‘थ्रेट परसेप्शन’ रिपोर्ट के आधार पर किया जाता है। यूपी के उप-मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य ने सदन में जवाब देते हुए कहा कि अखिलेश यादव की सुरक्षा में आज भी पर्याप्त सुरक्षाकर्मी तैनात हैं, जो कई अन्य महत्वपूर्ण नेताओं से भी अधिक हैं। भाजपा का दावा है कि अखिलेश यादव अब अप्रासंगिक हो चुके मुद्दों को उठाकर सुर्खियां बटोरने की कोशिश कर रहे हैं। इस विवाद ने उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक नई बहस छेड़ दी है, जहाँ आगामी चुनावों से पहले ‘वीआईपी सुरक्षा’ और ‘नेताओं की सुरक्षा’ एक बड़ा चुनावी मुद्दा बनती दिख रही है।



