धार्मिक

भीष्म पितामह जयंती: अटूट प्रतिज्ञा और इच्छा मृत्यु के वरदान का प्रतीक

आज 12 जनवरी 2026 को पूरे देश में भीष्म पितामह की जयंती श्रद्धापूर्वक मनाई जा रही है। महाभारत के सबसे महत्वपूर्ण और सम्मानित पात्रों में से एक, गंगापुत्र भीष्म को उनकी ‘भीष्म प्रतिज्ञा’ के लिए जाना जाता है, जिसके कारण उन्होंने आजीवन अविवाहित रहने और हस्तिनापुर के सिंहासन की रक्षा करने का संकल्प लिया था। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, भीष्म पितामह का जन्म इसी तिथि को हुआ था। आज के दिन श्रद्धालु उनके त्याग और दृढ़ संकल्प को याद करते हैं। विशेष रूप से कुरुक्षेत्र और अन्य पवित्र स्थानों पर लोग उनके निमित्त तर्पण और पूजा-अर्चना करते हैं, क्योंकि माना जाता है कि इस दिन पितरों का पूजन करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है।

भीष्म पितामह को उनके पिता राजा शांतनु से ‘इच्छा मृत्यु’ का वरदान प्राप्त था। महाभारत के युद्ध के दौरान, जब वे अर्जुन के बाणों से घायल होकर ‘शरशय्या’ (बाणों की शय्या) पर लेटे थे, तब उन्होंने सूर्य के उत्तरायण होने तक अपने प्राण नहीं त्यागे थे। पौराणिक कथाओं के अनुसार, अष्टमी तिथि को उनका अवतरण हुआ था और उन्होंने माघ शुक्ल एकादशी को अपना देह त्याग किया था। आज के दिन “भीष्म तर्पण” का विशेष महत्व है; माना जाता है कि जो लोग आज के दिन कुश और जल से भीष्म पितामह को अर्घ्य देते हैं, उनके पितृ प्रसन्न होते हैं और उन्हें संतान सुख व लंबी आयु का आशीर्वाद प्राप्त होता है।

आज के आधुनिक समय में भीष्म पितामह का जीवन अनुशासन, कर्तव्यनिष्ठा और वचन पालन की सबसे बड़ी प्रेरणा है। उन्होंने न्याय और धर्म की रक्षा के लिए अपने व्यक्तिगत सुखों का त्याग कर दिया था। देश के विभिन्न मंदिरों में आज धार्मिक सभाएं और प्रवचन आयोजित किए जा रहे हैं, जहाँ उनके द्वारा दिए गए ‘विष्णु सहस्रनाम’ और ‘राजधर्म’ के उपदेशों पर चर्चा की जा रही है। यह दिन हमें सिखाता है कि कठिन परिस्थितियों में भी अपने सिद्धांतों पर अडिग रहना ही वास्तविक पुरुषार्थ है। श्रद्धालु आज पवित्र नदियों में स्नान कर सूर्य देव और भीष्म पितामह की आराधना कर रहे हैं ताकि उनके जीवन में भी स्थिरता और संकल्प शक्ति का संचार हो सके।

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