
कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने आज केरल के वायनाड में एक जनसभा को संबोधित करते हुए केंद्र सरकार की विदेश नीति पर कड़ा हमला बोला और इसे “सिद्धांतविहीन और मजबूरी का सौदा” करार दिया। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की विदेश नीति भारत के दीर्घकालिक हितों के बजाय तात्कालिक दिखावे और कुछ चुनिंदा व्यापारिक घरानों के लाभ के लिए तैयार की गई है। राहुल गांधी के अनुसार, दुनिया के बड़े मंचों पर भारत की आवाज आज उतनी बुलंद नहीं है जितनी होनी चाहिए, क्योंकि सरकार केवल “इवेंट मैनेजमेंट” और फोटो खिंचवाने की कूटनीति में व्यस्त है। उन्होंने आरोप लगाया कि फिनलैंड, जापान और सिंगापुर जैसे देशों के साथ हालिया समझौते केवल ऊपरी चमक-धमक हैं, जबकि जमीनी हकीकत में भारत अपने पड़ोसियों के साथ संबंध सुधारने में पूरी तरह विफल रहा है। राहुल गांधी ने जोर देकर कहा कि एक मजबूत विदेश नीति आत्मनिर्भरता और स्पष्ट विजन से आती है, न कि अंतरराष्ट्रीय दबाव में झुककर लिए गए फैसलों से।
विदेश नीति के आर्थिक पहलुओं पर चर्चा करते हुए राहुल गांधी ने कहा कि मोदी सरकार विदेशों से निवेश लाने के नाम पर देश के संसाधनों को कौड़ियों के दाम बेचने का रास्ता साफ कर रही है। उन्होंने तर्क दिया कि ₹1.5 लाख करोड़ के जिन निवेश प्रस्तावों का ढिंढोरा पीटा जा रहा है, उनमें भारतीय युवाओं के लिए स्थायी रोजगार की कोई ठोस गारंटी नहीं है। राहुल के अनुसार, सरकार की कूटनीति का असली चेहरा तब सामने आता है जब चीन हमारी सीमाओं के भीतर घुसपैठ करता है और सरकार “लाल आंखें” दिखाने के बजाय चुप्पी साधे रहती है। उन्होंने सवाल उठाया कि यदि हमारी विदेश नीति इतनी ही सफल है, तो रूस-यूक्रेन और ईरान-इजरायल जैसे संघर्षों में भारत की मध्यस्थता का कोई ठोस परिणाम क्यों नहीं दिख रहा? राहुल गांधी ने कांग्रेस के कार्यकाल की ‘गुटनिरपेक्षता’ और ‘पंचशील’ सिद्धांतों की याद दिलाते हुए कहा कि भारत को अपनी स्वतंत्र पहचान बहाल करनी होगी।
संवाद के अंतिम चरण में राहुल गांधी ने 7 मार्च को तिरुवनंतपुरम के ‘टेक्नोपार्क’ में होने वाले अपने आगामी सत्र का जिक्र करते हुए कहा कि वे वहां युवाओं को बताएंगे कि असली ‘सॉफ्ट पावर’ तकनीक और शिक्षा से आती है, न कि खोखले नारों से। उन्होंने कहा कि मोदी सरकार की विदेश नीति “किसी की मजबूरी” इसलिए है क्योंकि इसमें भारत की जनता की भागीदारी नहीं है, बल्कि यह बंद कमरों में कुछ नौकरशाहों और कॉर्पोरेट सलाहकारों द्वारा तय की जाती है। राहुल ने चेतावनी दी कि यदि भारत ने अपनी रणनीतिक स्वायत्तता (Strategic Autonomy) के साथ समझौता करना जारी रखा, तो आने वाली पीढ़ियों को इसके गंभीर आर्थिक और सुरक्षा परिणाम भुगतने होंगे। उन्होंने आह्वान किया कि देश को एक ऐसी विदेश नीति की आवश्यकता है जो दुनिया के सामने झुकने के बजाय, उसे भारतीय मूल्यों और न्यायपूर्ण व्यवस्था का आईना दिखाए। राहुल गांधी का यह बयान आने वाले दिनों में संसद से लेकर सड़क तक सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच एक नई बहस छेड़ने के लिए तैयार है।



