
समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने माघ मेला 2026 और प्रयागराज में शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के साथ हुए व्यवहार को लेकर योगी सरकार पर तीखा हमला बोला है। 22 फरवरी 2026 को झांसी और फतेहपुर के दौरों के दौरान अखिलेश ने सीधे तौर पर मुख्यमंत्री पर निशाना साधते हुए कहा कि जिस सरकार में शंकराचार्य को गंगा स्नान से रोका जाए और बटुकों की शिखा (चोटी) खींचकर उन्हें अपमानित किया जाए, वह सरकार ‘अधर्मी’ है। उन्होंने आरोप लगाया कि भाजपा सत्ता के अहंकार में चूर होकर सनातन परंपराओं का अपमान कर रही है। अखिलेश ने तंज कसते हुए कहा कि केवल भगवा वस्त्र पहनने या कान छिदवाने से कोई ‘योगी’ नहीं हो जाता; सच्चा योगी वही है जो दूसरों के दुख को समझे और न्याय के मार्ग पर चले। उनके इस बयान ने यूपी की राजनीति में ‘असली बनाम नकली सनातनी’ की एक नई बहस छेड़ दी है।
अखिलेश यादव ने प्रयागराज की घटना का जिक्र करते हुए कहा कि कड़ाके की ठंड में जब शंकराचार्य धरने पर बैठे थे, तब सरकार के मंत्री और अधिकारी संवेदनहीन बने रहे। उन्होंने उपमुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक पर भी निशाना साधा और पूछा कि जब संतों का अपमान हो रहा था, तब “सत्ता के सूरमा” कहाँ छिपे थे? सपा प्रमुख ने चेतावनी दी कि साधु-संतों का अपमान देश और प्रदेश के लिए शुभ नहीं है और समाजवादी पार्टी इस अन्याय के खिलाफ डटकर खड़ी रहेगी। अखिलेश ने यह भी मांग की कि मुख्यमंत्री को इस पूरे प्रकरण के लिए सार्वजनिक रूप से माफी मांगनी चाहिए, क्योंकि माफी मांगना कमजोरी नहीं बल्कि साहस का काम है। उन्होंने कहा कि भाजपा राज में अब संतों को भी अपनी धार्मिक क्रियाओं के लिए अधिकारियों के आगे गिड़गिड़ाना पड़ रहा है, जो भारतीय संस्कृति के लिए एक काला अध्याय है।
इस जुबानी जंग के जवाब में अखिल भारतीय संत समिति और भाजपा प्रवक्ताओं ने अखिलेश यादव को उनके पिता के कार्यकाल की याद दिलाते हुए ‘कारसेवकों पर गोलीबारी’ का मुद्दा उछाल दिया है। भाजपा का तर्क है कि कानून और व्यवस्था बनाए रखना सरकार की जिम्मेदारी है और किसी को भी सुरक्षा नियमों के उल्लंघन की अनुमति नहीं दी जा सकती। हालांकि, अखिलेश यादव ने 2027 के विधानसभा चुनावों का बिगुल फूंकते हुए कहा कि जनता इस “अहंकारी सरकार” को संतों के अपमान का करारा जवाब देगी। उन्होंने स्पष्ट किया कि उनकी लड़ाई ‘पीडीए’ (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) के साथ-साथ उन सभी वर्गों के सम्मान के लिए है जिन्हें भाजपा ने हाशिए पर धकेल दिया है। इस विवाद ने उत्तर प्रदेश के धार्मिक और राजनीतिक गलियारों में एक ऐसा ध्रुवीकरण पैदा कर दिया है, जिसकी गूंज आने वाले समय में और भी तेज सुनाई देगी।



