
ज्योतिष्पीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती के खिलाफ हुई कानूनी कार्रवाई और भाजपा नेताओं की कुछ टिप्पणियों को लेकर कांग्रेस ने उत्तर प्रदेश की योगी सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। कांग्रेस ने आरोप लगाया है कि भाजपा अपनी राजनीतिक सुविधा के लिए संतों का इस्तेमाल करती है और जब वही संत सरकार की कमियों पर सवाल उठाते हैं, तो उन्हें अपमानित किया जाता है। पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष ने लखनऊ में एक विरोध प्रदर्शन के दौरान कहा कि शंकराचार्य जैसे उच्च पद पर आसीन व्यक्ति के खिलाफ इस तरह की कार्रवाई और चरित्र हनन की कोशिशें करोड़ों हिंदुओं की आस्था पर चोट हैं। कांग्रेस इसे ‘सनातन धर्म का असली अपमान’ बताते हुए मांग कर रही है कि सरकार संतों के प्रति अपनी द्वेषपूर्ण राजनीति बंद करे।
विवाद की जड़ शंकराचार्य द्वारा पिछले कुछ समय में सरकार की नीतियों और धार्मिक आयोजनों पर उठाई गई आपत्तियों को माना जा रहा है। कांग्रेस का तर्क है कि भाजपा का ‘हिंदुत्व’ केवल वोट बैंक के लिए है, जबकि असली धर्मगुरुओं का सम्मान करना उनके एजेंडे में कभी रहा ही नहीं। पार्टी ने याद दिलाया कि कैसे शंकराचार्य ने राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा से लेकर अन्य मुद्दों पर शास्त्रीय आपत्तियां दर्ज कराई थीं, जिसे भाजपा ने अपने विरोध के रूप में लिया। कांग्रेस अब इसे ‘संत बनाम सत्ता’ की लड़ाई के रूप में पेश कर रही है और यूपी के हर जिले में इस मुद्दे को ले जाने की तैयारी में है। विपक्ष ने चेतावनी दी है कि यदि संतों का अपमान जारी रहा, तो जनता भाजपा को कभी माफ नहीं करेगी।
भाजपा ने कांग्रेस के इस ‘प्रेम’ को महज चुनावी नौटंकी और तुष्टीकरण का नया चेहरा बताया है। सरकारी प्रवक्ताओं का कहना है कि कानून अपना काम कर रहा है और किसी को भी पद की आड़ में जांच से बचने का अधिकार नहीं है। भाजपा का दावा है कि जो कांग्रेस कल तक अयोध्या में मंदिर निर्माण का विरोध कर रही थी, वह आज संतों की हितैषी होने का ढोंग कर रही है। सरकार ने स्पष्ट किया है कि कोई भी व्यक्ति कानून से ऊपर नहीं है और जांच की निष्पक्षता पर सवाल उठाना न्यायपालिका का अपमान है। इस सियासी घमासान ने उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक नया ध्रुवीकरण पैदा कर दिया है, जहाँ अब धर्मगुरुओं के सम्मान और कानूनी प्रक्रिया के बीच की पतली रेखा पर बड़ी बहस छिड़ गई है।



