
विवाद की शुरुआत तब हुई जब विधानसभा की कार्यवाही शुरू होने से पहले ‘वंदे मातरम’ के अनिवार्य गायन का प्रस्ताव रखा गया। भाजपा विधायकों ने इसे राष्ट्र के प्रति सम्मान और गुजरात की सांस्कृतिक पहचान से जोड़ते हुए पुरजोर समर्थन किया। दूसरी ओर, कांग्रेस और निर्दलीय विधायकों ने इस पर आपत्ति जताते हुए कहा कि वे गीत का विरोध नहीं कर रहे हैं, बल्कि इसे ‘अनिवार्य’ बनाने की प्रक्रिया और सदन की नियमावली में बिना चर्चा के बदलाव का विरोध कर रहे हैं। इस मुद्दे ने जल्द ही राजनीतिक रंग ले लिया और सदन में जमकर नारेबाजी हुई, जिसके कारण कार्यवाही को कई बार स्थगित करना पड़ा।
सदन में तीखी नोकझोंक और आरोप-प्रत्यारोप
संसदीय कार्य मंत्री ने विपक्ष पर ‘राष्ट्रविरोधी मानसिकता’ होने का आरोप लगाया, जिसके जवाब में विपक्षी नेताओं ने इसे भाजपा का ‘चुनावी स्टंट’ करार दिया। कांग्रेस विधायक दल के नेता ने तर्क दिया कि देशभक्ति किसी विशेष गीत को गाने के आदेश से साबित नहीं होती, बल्कि जनता के मुद्दों को सुलझाने से होती है। इस रार के दौरान सदन में ‘भारत माता की जय’ और ‘संविधान बचाओ’ के नारे एक साथ गूंजते रहे। स्थिति तब और बिगड़ गई जब कुछ विधायकों ने वेल में आकर प्रदर्शन किया, जिसके परिणामस्वरूप विधानसभा अध्यक्ष को कड़ा रुख अपनाते हुए कुछ सदस्यों को दिन भर के लिए निलंबित करना पड़ा।
संवैधानिक गरिमा और सामाजिक प्रभाव
गुजरात की राजनीति में इस ‘वंदे मातरम’ विवाद ने आम जनता के बीच भी ध्रुवीकरण की स्थिति पैदा कर दी है। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि सदन के भीतर किसी भी नई परंपरा को शुरू करने के लिए ‘बिजनेस एडवाइजरी कमेटी’ की सहमति आवश्यक होती है। भाजपा इसे अपनी वैचारिक जीत के रूप में देख रही है, जबकि विपक्ष इसे बुनियादी मुद्दों जैसे बेरोजगारी और महंगाई से ध्यान भटकाने की साजिश मान रहा है। वर्तमान में यह मामला शांत होता नहीं दिख रहा है और आने वाले दिनों में गुजरात की राजनीति में ‘राष्ट्रवाद बनाम अधिकार’ की यह जंग और तेज होने की संभावना है।



