
संसद के बजट सत्र 2026 के दौरान राष्ट्रपति के अभिभाषण पर ‘धन्यवाद प्रस्ताव’ (Motion of Thanks) पर चर्चा के दौरान सोमवार और मंगलवार को भारी हंगामा देखने को मिला। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी द्वारा पूर्व सेना प्रमुख जनरल एम.एम. नरवणे की एक अप्रकाशित संस्मरण (Memoir) के अंशों को उद्धृत करने के बाद सदन में गतिरोध उत्पन्न हो गया। राहुल गांधी ने चीन के साथ सीमा विवाद और 2020 की घटनाओं का जिक्र करते हुए सरकार पर तीखे हमले किए, जिस पर रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और गृह मंत्री अमित शाह ने कड़ी आपत्ति जताई। सत्ता पक्ष का तर्क था कि बिना प्रमाणित और अप्रकाशित सामग्री को सदन के पटल पर रखना संसदीय नियमों का उल्लंघन है। इस तीखी बहस और शोर-शराबे के कारण लोकसभा की कार्यवाही को कई बार स्थगित करना पड़ा, जिससे विधायी कार्यों में व्यवधान उत्पन्न हुआ।
राज्यसभा में भी स्थिति कुछ अलग नहीं थी, जहां विपक्ष ने बजट में बेरोजगारी और महंगाई जैसे मुद्दों को नजरअंदाज करने का आरोप लगाते हुए सरकार को घेरा। संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने विपक्ष पर जानबूझकर सदन की गरिमा को ठेस पहुँचाने और देश की छवि खराब करने का आरोप लगाया। उन्होंने स्पष्ट किया कि राष्ट्रपति का अभिभाषण सरकार के विजन और ‘विकसित भारत’ के संकल्प का प्रतीक है, जिस पर सार्थक चर्चा होनी चाहिए न कि अनावश्यक हंगामा। चर्चा में भाग लेते हुए भाजपा सांसद तेजस्वी सूर्या ने पिछले दशक की उपलब्धियों को गिनाया और विपक्ष के आरोपों को ‘नकारात्मक राजनीति’ करार दिया। विपक्ष और सत्ता पक्ष के बीच इस वैचारिक टकराव ने सदन के माहौल को काफी गरमा दिया है, जिससे सदन की उत्पादकता पर सवाल उठ रहे हैं।
संवैधानिक प्रावधानों के अनुसार, राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव के लिए कुल 18 घंटे का समय निर्धारित किया गया है, जिसकी चर्चा 4 फरवरी तक चलने की उम्मीद है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 4 फरवरी को लोकसभा में इस चर्चा का उत्तर देंगे, जिसमें वे विपक्ष के सवालों का जवाब देने के साथ-साथ सरकार की भावी योजनाओं का खाका प्रस्तुत करेंगे। लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने बार-बार सदस्यों से सदन की मर्यादा बनाए रखने और नियमों के भीतर अपनी बात रखने की अपील की है। हालांकि, मौजूदा राजनीतिक समीकरणों को देखते हुए यह स्पष्ट है कि आगामी कुछ दिनों तक संसद के दोनों सदनों में सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच यह रस्साकशी जारी रहेगी। यह बहस न केवल नीतिगत मुद्दों पर है, बल्कि आगामी चुनावों के मद्देनजर अपनी-अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करने की कोशिश भी दिखाई दे रही है।



