बांग्लादेश संकट: तारिक रहमान का शक्ति प्रदर्शन और शेख हसीना के गंभीर आरोप

बांग्लादेश की राजनीति में एक बड़ा मोड़ तब आया जब लंबे निर्वासन के बाद बीएनपी (BNP) नेता तारिक रहमान के समर्थन में ढाका की सड़कों पर लाखों की भीड़ उमड़ पड़ी। ढाका के अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे से लेकर पार्टी मुख्यालय तक का इलाका जनसैलाब से अटा नजर आया, जिसे तख्तापलट के बाद शक्ति प्रदर्शन के तौर पर देखा जा रहा है। समर्थकों के इस भारी हुजूम ने स्पष्ट कर दिया है कि अवामी लीग के पतन के बाद अब बीएनपी देश की मुख्य राजनीतिक शक्ति के रूप में उभरने को तैयार है। तारिक रहमान ने अपने संबोधन में देश में जल्द से जल्द लोकतांत्रिक चुनाव कराने और कानून व्यवस्था बहाल करने की मांग दोहराई, जबकि अंतरिम सरकार भीड़ प्रबंधन और सुरक्षा व्यवस्था बनाए रखने के लिए संघर्ष करती दिखी।
दूसरी ओर, भारत में शरण ले रखीं पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना ने मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार पर तीखा हमला बोला है। हसीना ने एक आधिकारिक बयान जारी कर आरोप लगाया कि यूनुस सरकार के संरक्षण में बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों, विशेषकर हिंदुओं के खिलाफ ‘अकल्पनीय अत्याचार’ किए जा रहे हैं। उन्होंने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से हस्तक्षेप की अपील करते हुए कहा कि उनके समर्थकों और धार्मिक अल्पसंख्यकों को चुन-चुनकर निशाना बनाया जा रहा है, उनके घरों को जलाया जा रहा है और धार्मिक स्थलों को अपवित्र किया जा रहा है। हसीना का यह बयान ऐसे समय में आया है जब ढाका में इस्कॉन के पुजारी की गिरफ्तारी को लेकर पहले से ही तनाव चरम पर है।
बांग्लादेश के भीतर पैदा हुआ यह दोहरा संकट—एक तरफ बढ़ता राजनीतिक उन्माद और दूसरी तरफ मानवाधिकारों के उल्लंघन के आरोप—अंतरिम सरकार के लिए बड़ी चुनौती बन गया है। मोहम्मद यूनुस की सरकार ने हसीना के आरोपों को ‘आधारहीन’ करार दिया है, लेकिन ज़मीनी हकीकत और अल्पसंख्यकों के बीच व्याप्त डर ने दुनिया भर का ध्यान अपनी ओर खींचा है। संयुक्त राष्ट्र और कई मानवाधिकार संगठनों ने हिंसा की निष्पक्ष जांच की मांग की है। जैसे-जैसे चुनाव की मांग तेज हो रही है, बांग्लादेश में सत्ता का संघर्ष और अधिक हिंसक होने की आशंका है, जिससे न केवल ढाका बल्कि पड़ोसी देश भारत की सीमा सुरक्षा और कूटनीतिक संतुलन पर भी गहरा असर पड़ रहा है।



