विदेश

भारत-बांग्लादेश राजनयिक गतिरोध: बढ़ता तनाव और अल्पसंख्यकों की सुरक्षा का संकट

भारत और बांग्लादेश के बीच द्विपक्षीय संबंधों में पिछले कुछ दशकों की सबसे गंभीर कड़वाहट देखी जा रही है, जिसका मुख्य कारण बांग्लादेश में तख्तापलट के बाद हिंदू अल्पसंख्यकों पर लगातार हो रहे हमले और धार्मिक स्थलों की बेअदबी है। ढाका में इस्कॉन (ISKCON) के पुजारी चिन्मय कृष्ण दास की गिरफ्तारी और उसके बाद भड़की हिंसा ने दिल्ली की चिंताओं को और गहरा कर दिया है। भारत ने अंतरराष्ट्रीय मंचों पर इन घटनाओं पर कड़ी आपत्ति जताई है, जबकि बांग्लादेश की अंतरिम सरकार इन आरोपों को सिरे से खारिज कर रही है। यह तनाव अब सड़क से निकलकर सीधे राजनयिक गलियारों तक पहुँच गया है, जिससे दक्षिण एशिया की क्षेत्रीय स्थिरता और दोनों पड़ोसी देशों के बीच वर्षों से बने भरोसे पर एक बड़ा प्रश्नचिन्ह खड़ा हो गया है।

राजनयिक स्तर पर तनातनी इतनी बढ़ गई है कि दोनों देशों ने एक-दूसरे के उच्चायुक्तों (High Commissioners) को तलब कर अपनी सख्त नाराजगी दर्ज कराई है। भारतीय विदेश मंत्रालय ने बांग्लादेश के उच्चायुक्त को बुलाकर अगरतला में सहायक उच्चायोग पर हुए हमले और वहां के राजनयिकों की सुरक्षा में हुई चूक पर कड़ा विरोध जताया। जवाब में, बांग्लादेशी विदेश मंत्रालय ने भी भारतीय उच्चायुक्त को तलब कर भारत में बांग्लादेशी संपत्तियों के प्रति कथित अनादर पर चिंता व्यक्त की। विएना कन्वेंशन के तहत राजनयिक मिशनों की सुरक्षा सुनिश्चित करना मेजबान देश की प्राथमिक जिम्मेदारी है, लेकिन मौजूदा माहौल में दोनों ही पक्षों के बीच संचार की खिड़की संकुचित होती दिख रही है, जो भविष्य के रिश्तों के लिए चुनौतीपूर्ण संकेत है।

इस तनाव का सीधा असर व्यापार, आवाजाही और सीमा सुरक्षा पर पड़ने की आशंका है, जिससे दोनों देशों के आम नागरिक प्रभावित हो सकते हैं। भारत ने स्पष्ट किया है कि जब तक बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों के प्रति न्यायपूर्ण वातावरण और भारतीय राजनयिक परिसरों की सुरक्षा की गारंटी नहीं मिलती, तब तक संबंधों का सामान्य होना कठिन है। दूसरी ओर, बांग्लादेश के भीतर चरमपंथी तत्वों की बढ़ती सक्रियता और भारत विरोधी नारों ने दिल्ली को ‘वेट एंड वॉच’ (Wait and Watch) की मुद्रा में डाल दिया है। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या दोनों देश बातचीत के माध्यम से इस गतिरोध को सुलझा पाते हैं या फिर यह शीत युद्ध जैसे हालात सीमावर्ती क्षेत्रों में तनाव को और अधिक हवा देंगे।

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