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बिहार की राजनीति में बड़ा भूचाल: क्या नीतीश कुमार छोड़ेंगे सीएम की कुर्सी?

बिहार की राजनीति में आज, 6 मार्च 2026 को एक ऐतिहासिक ‘युग परिवर्तन’ की आहट सुनाई दे रही है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कल, 5 मार्च को पटना में राज्यसभा के लिए अपना नामांकन दाखिल कर दिया है, जिससे उनके मुख्यमंत्री पद छोड़ने और दिल्ली जाने की अटकलों पर मुहर लग गई है। इस महत्वपूर्ण मौके पर केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह खुद पटना में मौजूद रहे, जो इस बात का संकेत है कि भाजपा और जेडीयू (JD-U) के बीच सत्ता हस्तांतरण की रूपरेखा पूरी तरह तैयार हो चुकी है। नीतीश कुमार ने सोशल मीडिया पर अपनी इच्छा जाहिर करते हुए कहा कि उनके मन में शुरू से ही संसद के दोनों सदनों का सदस्य बनने की इच्छा थी, और अब वे राज्यसभा के जरिए देश की सेवा करने के लिए तैयार हैं। उनके इस कदम के साथ ही बिहार में उनके लगभग 20 साल पुराने शासन का अंत होता दिख रहा है, जिससे राज्य में एक नए नेतृत्व की तलाश तेज हो गई है।

अमित शाह की मौजूदगी में नीतीश कुमार के इस ‘शक्ति प्रदर्शन’ ने विपक्षी दलों, विशेषकर राजद (RJD) को तीखे हमले करने का मौका दे दिया है। तेजस्वी यादव ने इसे जनता के जनादेश के साथ विश्वासघात बताया है, जबकि जेडीयू कार्यकर्ताओं का एक वर्ग अब भी नीतीश कुमार के दिल्ली जाने के फैसले का विरोध कर रहा है। चर्चा है कि नीतीश कुमार के इस्तीफे के बाद बिहार में पहली बार भाजपा का मुख्यमंत्री बन सकता है, जिसमें सम्राट चौधरी और नित्यानंद राय के नाम रेस में सबसे आगे चल रहे हैं। वहीं, जेडीयू के भीतर असंतोष को थामने के लिए नीतीश कुमार के बेटे निशांत कुमार को सक्रिय राजनीति में उतारने और उन्हें नई सरकार में ‘डिप्टी सीएम’ जैसी बड़ी जिम्मेदारी देने की भी प्रबल संभावना जताई जा रही है। अमित शाह ने नीतीश कुमार के कार्यकाल को “स्वर्ण काल” बताते हुए उनके बेदाग राजनीतिक जीवन की सराहना की है, जो इस विदाई को और भी गरिमापूर्ण बनाने की कोशिश है।

पटना के 1, अणे मार्ग स्थित मुख्यमंत्री आवास पर बैठकों का दौर जारी है, जहाँ एनडीए के वरिष्ठ नेता अगले 48 घंटों में नए ‘महारथी’ के नाम की आधिकारिक घोषणा कर सकते हैं। राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि नीतीश कुमार 10 अप्रैल 2026 तक पद पर बने रह सकते हैं और उसके बाद ही वे सांसद के रूप में शपथ लेने दिल्ली जाएंगे। इस बदलाव का असर न केवल बिहार की विकास योजनाओं पर पड़ेगा, बल्कि यह 2029 के लोकसभा चुनावों के लिए एनडीए के नए समीकरणों को भी तय करेगा। नीतीश कुमार ने भरोसा दिलाया है कि नई सरकार को उनका पूरा मार्गदर्शन और सहयोग मिलता रहेगा, लेकिन “सुशासन बाबू” के बिना बिहार की राजनीति कैसी होगी, यह देखना दिलचस्प होगा। क्या बिहार अब पूरी तरह से भाजपा के ‘डबल इंजन’ मॉडल पर आगे बढ़ेगा या जेडीयू का नया चेहरा क्षेत्रीय पहचान को बरकरार रख पाएगा, यह आने वाला वक्त ही बताएगा।

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