
समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने पश्चिम एशिया में गहराते युद्ध और वैश्विक अस्थिरता के बीच केंद्र की भाजपा सरकार पर तीखा हमला बोला है। 2 मार्च 2026 को लखनऊ में पत्रकारों से बातचीत करते हुए अखिलेश ने सरकार की विदेश नीति और रणनीतिक चुप्पी पर सवाल उठाते हुए पूछा कि भारत का स्पष्ट रुख क्या है। उन्होंने कहा कि एक तरफ सरकार विश्व गुरु बनने का दावा करती है, वहीं दूसरी ओर मानवता पर मंडराते संकट पर उसका स्टैंड धुंधला दिखाई देता है। अखिलेश ने पूछा— “सरकार साफ करे कि वह हथियारों की होड़ और जंग के उन्माद के साथ खड़ी है या महात्मा गांधी के ‘अमन और अहिंसा’ के मार्ग के साथ?” उनके इस बयान ने अंतरराष्ट्रीय मुद्दों को घरेलू राजनीति के केंद्र में लाकर खड़ा कर दिया है।
अखिलेश यादव ने अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए कहा कि युद्ध केवल सीमाओं पर नहीं लड़ा जाता, बल्कि इसकी कीमत आम आदमी को महंगाई और बेरोजगारी के रूप में चुकानी पड़ती है। उन्होंने सरकार को चेतावनी दी कि अगर तेल की कीमतें बढ़ीं और सप्लाई चेन प्रभावित हुई, तो भारत का मध्यम वर्ग पूरी तरह टूट जाएगा। सपा प्रमुख ने आरोप लगाया कि सरकार केवल बड़े आयोजनों और फोटो खिंचवाने में व्यस्त है, जबकि उसे युद्धग्रस्त क्षेत्रों में फंसे भारतीय छात्रों और मजदूरों की सुरक्षा के लिए ठोस योजना पेश करनी चाहिए। उन्होंने प्रधानमंत्री से मांग की कि वे संसद में आकर देश को बताएं कि भारत इस वैश्विक तनाव को कम करने के लिए कौन से ठोस कूटनीतिक कदम उठा रहा है, न कि केवल सोशल मीडिया पर शांति का संदेश दे।
विपक्ष के इस ‘अमन’ वाले कार्ड ने भाजपा खेमे में भी तीखी प्रतिक्रिया पैदा की है, जहाँ सत्ता पक्ष इसे “अप्रासंगिक राजनीति” करार दे रहा है। भाजपा प्रवक्ताओं का तर्क है कि भारत ने हमेशा शांति का समर्थन किया है, जैसा कि पीएम मोदी ने पहले ही “आज का युग युद्ध का नहीं है” कहकर स्पष्ट कर दिया है। हालांकि, अखिलेश के इस सवाल ने यह संकेत दिया है कि आने वाले समय में विपक्ष ‘राष्ट्रीय सुरक्षा’ और ‘वैश्विक नीति’ को आगामी चुनावी मुद्दा बनाने से पीछे नहीं हटेगा। अखिलेश ने अंत में जोर देकर कहा कि असली ताकत जंग जीतने में नहीं, बल्कि जंग को रोकने में है, और भारत को एक बार फिर दुनिया को शांति का नेतृत्व करना चाहिए। इस जुबानी जंग ने लखनऊ से लेकर दिल्ली तक के सियासी गलियारों को गर्मा दिया है।



