
विपक्षी गठबंधन ‘INDIA’ के भीतर 2026 के विधानसभा चुनावों से पहले दरारें गहरी होती नजर आ रही हैं। सबसे बड़ा झटका पश्चिम बंगाल से लगा है, जहाँ कांग्रेस ने राज्य की सभी 294 विधानसभा सीटों पर अकेले चुनाव लड़ने का ऐलान कर दिया है। ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस (TMC) के साथ सीट-बंटवारे पर सहमति न बन पाने और स्थानीय स्तर पर कार्यकर्ताओं के बीच बढ़ते असंतोष के कारण कांग्रेस ने ‘एकला चलो’ की नीति अपनाई है। इस फैसले ने न केवल बंगाल में विपक्षी एकता को कमजोर किया है, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर भी गठबंधन के भविष्य पर सवालिया निशान लगा दिए हैं। टीएमसी नेताओं का मानना है कि कांग्रेस का यह कदम अंततः बीजेपी को फायदा पहुँचाएगा, जबकि कांग्रेस इसे अपने वजूद को बचाने की लड़ाई बता रही है।
दक्षिण भारत में भी गठबंधन की राह आसान नहीं दिख रही है। तमिलनाडु में सत्ताधारी डीएमके (DMK) और कांग्रेस के बीच ‘सत्ता में हिस्सेदारी’ (Power Sharing) को लेकर खींचतान बढ़ गई है। मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन ने स्पष्ट कर दिया है कि तमिलनाडु में गठबंधन की सरकार की कोई गुंजाइश नहीं है, जबकि कांग्रेस के कुछ वरिष्ठ नेता शासन में भागीदारी की मांग कर रहे हैं। हाल ही में स्टालिन ने इन मांगों को “गठबंधन को तोड़ने की साजिश” करार दिया, जिससे दोनों दलों के बीच कड़वाहट बढ़ गई है। पुडुचेरी और केरल में भी स्थानीय नेतृत्व के बीच टकराव की खबरें आ रही हैं, जिससे गठबंधन के सामूहिक नेतृत्व (Collective Leadership) की क्षमता पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि 2026 के पांच राज्यों (बंगाल, तमिलनाडु, केरल, असम और पुडुचेरी) के चुनाव ‘INDIA’ गठबंधन के लिए एक ‘एसिड टेस्ट’ साबित होंगे। असम में प्रियंका गांधी के सक्रिय होने और गठबंधन की स्क्रीनिंग कमेटी की कमान संभालने से एक नई उम्मीद तो जगी है, लेकिन क्षेत्रीय दलों की बढ़ती महत्वाकांक्षाएं कांग्रेस के लिए बड़ी चुनौती बनी हुई हैं। विपक्ष के भीतर यह बहस तेज हो गई है कि क्या यह गठबंधन केवल लोकसभा चुनावों तक ही सीमित था या यह राज्यों में भी प्रभावी रह पाएगा। फिलहाल, घटक दलों के बीच बढ़ते सार्वजनिक आरोप-प्रत्यारोप और सीट-बंटवारे में देरी ने गठबंधन की एकता के दावों की हवा निकाल दी है।



