
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बार फिर भारत को कड़े आर्थिक परिणामों की चेतावनी दी है। आज, 5 जनवरी 2026 को एयर फोर्स वन पर पत्रकारों से बात करते हुए ट्रंप ने स्पष्ट किया कि यदि भारत रूसी कच्चे तेल की खरीद के मुद्दे पर अमेरिका की बात नहीं मानता, तो वे भारतीय वस्तुओं पर टैरिफ (आयात शुल्क) को “बहुत तेजी से” बढ़ा सकते हैं। ट्रंप ने सीधे तौर पर इस मुद्दे को व्यक्तिगत सम्मान और द्विपक्षीय व्यापार से जोड़ते हुए कहा, “प्रधानमंत्री मोदी एक अच्छे व्यक्ति हैं, लेकिन वे जानते हैं कि मैं इस (रूसी तेल खरीद) से खुश नहीं हूं। मुझे खुश रखना जरूरी है।” यह बयान ऐसे समय में आया है जब भारत और अमेरिका एक बड़े व्यापार समझौते की दिशा में बातचीत कर रहे हैं।
ट्रंप प्रशासन पहले ही अगस्त 2025 में भारत पर 50% तक का टैरिफ लगा चुका है, जिसमें से 25% शुल्क विशेष रूप से रूसी तेल खरीदने के लिए “सजा” के तौर पर लगाया गया था। वर्तमान में भारत रूस के समुद्री कच्चे तेल का सबसे बड़ा खरीदार है, जो अमेरिकी हितों और रूस पर लगाए गए पश्चिमी प्रतिबंधों के खिलाफ माना जा रहा है। ट्रंप का ताजा रुख यह संकेत देता है कि अमेरिका अपने व्यापार घाटे को कम करने और रूस के राजस्व को सीमित करने के लिए टैरिफ को एक हथियार की तरह इस्तेमाल करना जारी रखेगा। व्हाइट हाउस द्वारा जारी ऑडियो में ट्रंप को यह कहते सुना जा सकता है कि भारत के पास व्यापार करने के लिए अमेरिका एक बड़ा बाजार है और वे इस पर बहुत जल्द कार्रवाई कर सकते हैं।
इस दबाव के जवाब में भारतीय अधिकारियों ने ऊर्जा सुरक्षा को प्राथमिकता देते हुए अपनी स्थिति स्पष्ट रखी है। हालांकि, कूटनीतिक सूत्रों के अनुसार, भारत ने रिफाइनरों से रूसी और अमेरिकी तेल खरीद के साप्ताहिक आंकड़ों का खुलासा करने को कहा है ताकि वाशिंगटन के साथ होने वाली बातचीत में सटीक तथ्य रखे जा सकें। विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रंप की यह “प्रेशर टैक्टिक्स” भारत को अमेरिकी कृषि उत्पादों के लिए अपना बाजार खोलने या रूसी तेल पर निर्भरता कम करने के लिए मजबूर करने की एक कोशिश है। यदि यह गतिरोध बना रहता है, तो भारतीय निर्यात (विशेषकर कपड़ा, इंजीनियरिंग और आईटी सेवाओं) पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है, जिससे दोनों देशों के बीच संबंधों में खटास आने की आशंका है।



