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योगी आदित्यनाथ vs शंकराचार्य: सत्ता और संन्यास के बीच छिड़ा भीषण संग्राम

उत्तर प्रदेश की राजनीति और धर्म के गलियारों में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और ज्योतिष्पीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के बीच जारी गतिरोध अब एक तीखी वैचारिक और कानूनी जंग में तब्दील हो गया है। विवाद की शुरुआत तब हुई जब माघ मेले के दौरान शंकराचार्य को त्रिवेणी संगम पर पारंपरिक पालकी से जाने से रोका गया, जिसके विरोध में उन्होंने 11 दिनों तक अन्न त्याग दिया था। इसके बाद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने विधानसभा में बिना नाम लिए कड़ा प्रहार करते हुए कहा कि “हर व्यक्ति शंकराचार्य नहीं बन सकता” और “कोई भी कानून से ऊपर नहीं है।” पीएम मोदी की इजरायल यात्रा से वापसी और बजट सत्र के बीच, यह मुद्दा अब ‘सनातन की व्याख्या’ को लेकर एक बड़े राजनीतिक ध्रुवीकरण का केंद्र बन गया है, जहाँ एक तरफ प्रशासनिक अनुशासन है और दूसरी तरफ सदियों पुरानी धार्मिक परंपराओं का दावा।

इस विवाद ने तब और भी गंभीर मोड़ ले लिया जब प्रयागराज की एक विशेष पॉक्सो (POCSO) कोर्ट के आदेश पर शंकराचार्य के खिलाफ यौन उत्पीड़न जैसे संगीन आरोपों में एफआईआर दर्ज की गई। जहाँ सरकार इसे कानून की एक निष्पक्ष प्रक्रिया बता रही है, वहीं शंकराचार्य ने इसे “सरकारी प्रतिशोध” और “चरित्र हनन की साजिश” करार दिया है। उन्होंने मुख्यमंत्री की हिंदू साख पर सवाल उठाते हुए उन्हें 40 दिनों के भीतर ‘हिंदू होने का प्रमाण’ देने की चुनौती तक दे डाली है और 11 मार्च को लखनऊ में ‘धर्म संसद’ बुलाने का ऐलान किया है। स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का तर्क है कि एक संन्यासी राजा नहीं हो सकता और जो सत्ता के अहंकार में संतों का अपमान करे, वह सनातन धर्म का रक्षक नहीं हो सकता। इन आरोपों-प्रत्यारोपों ने राज्य के डिप्टी सीएम और मंत्रियों के बीच भी मतभेदों को उजागर किया है, जो इस संवेदनशील मुद्दे पर अलग-अलग सुर अलाप रहे हैं।

विपक्ष, विशेषकर समाजवादी पार्टी और कांग्रेस, इस मौके को भुनाने में कोई कसर नहीं छोड़ रहा है और इसे “संत बनाम सत्ता” की लड़ाई के रूप में पेश कर रहा है। अखिलेश यादव और अजय राय ने सीधे तौर पर शंकराचार्य का समर्थन करते हुए योगी सरकार पर संतों को प्रताड़ित करने का आरोप लगाया है। हालांकि, 27 फरवरी 2026 को इलाहाबाद हाई कोर्ट से शंकराचार्य को बड़ी राहत मिली है, जहाँ अदालत ने उनकी गिरफ्तारी पर अंतरिम रोक लगा दी है। कोर्ट के इस फैसले को विपक्ष ने सरकार की नैतिक हार बताया है, जबकि भाजपा इसे केवल एक कानूनी प्रक्रिया का हिस्सा मान रही है। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि 11 मार्च की ‘धर्म संसद’ और कोर्ट की अगली सुनवाई इस हाई-प्रोफाइल विवाद को किस दिशा में ले जाती है, क्योंकि यह लड़ाई अब केवल दो व्यक्तियों की नहीं, बल्कि ‘राजधर्म’ और ‘धर्मदंड’ के वर्चस्व की बन चुकी है।

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