
विपक्ष के आरोप और रणनीतिक स्वायत्तता पर सवाल बजट सत्र के दौरान लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी और अन्य विपक्षी नेताओं ने भारत-अमेरिका व्यापार समझौते को लेकर सरकार पर कड़ा प्रहार किया है। विपक्ष का आरोप है कि यह समझौता “एकतरफा” है और सरकार ने अमेरिकी दबाव में आकर देश के हितों से समझौता किया है। राहुल गांधी ने इसे “पूर्ण समर्पण” (Wholesale Surrender) करार देते हुए कहा कि अमेरिका भारत को यह निर्देश दे रहा है कि वह किस देश (विशेषकर रूस) से तेल खरीदे और किससे नहीं। विपक्षी सांसदों का तर्क है कि इससे भारत की ‘रणनीतिक स्वायत्तता’ (Strategic Autonomy) खतरे में पड़ गई है और ऊर्जा सुरक्षा को बाहरी ताकतों के हवाले कर दिया गया है।
कृषि क्षेत्र और किसानों की चिंताएँ इस विवाद का दूसरा बड़ा केंद्र कृषि और डेयरी क्षेत्र है। समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव और डीएमके सांसदों ने चिंता जताई है कि अमेरिकी कृषि उत्पादों के लिए भारतीय बाजार खोलने से स्थानीय किसानों को भारी नुकसान होगा। विपक्ष का दावा है कि सब्सिडी वाले अमेरिकी उत्पादों के आने से भारतीय किसानों की उपज की कीमतें गिर जाएंगी, जिससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था चरमरा सकती है। विशेष रूप से दालों, सोयाबीन और डेयरी उत्पादों पर टैरिफ कम करने के प्रस्तावों को लेकर संसद से सड़क तक विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं। किसानों के संगठनों ने इस डील के विरोध में ‘भारत बंद’ और पुतला दहन जैसे कदम भी उठाए हैं।
सरकार का बचाव और संशोधित फैक्टशीट सरकार की ओर से वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण और वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने इन आरोपों को सिरे से खारिज किया है। सरकार का तर्क है कि यह समझौता भारत की आर्थिक वृद्धि और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में उसकी भूमिका को मजबूत करेगा। मंत्रियों ने स्पष्ट किया कि 500 अरब डॉलर की खरीद का लक्ष्य एक “इरादा” है, न कि कोई कानूनी बाध्यता। इस बीच, व्हाइट हाउस द्वारा जारी ‘संशोधित फैक्टशीट’ ने चर्चा को नया मोड़ दे दिया है, जिसमें से दालों के आयात और डिजिटल सर्विस टैक्स जैसे विवादित संदर्भों को हटा दिया गया है। सरकार इसे अपनी कूटनीतिक जीत बता रही है, जबकि विपक्ष इसे शुरुआती समझौते में रही खामियों का प्रमाण मान रहा है।



