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लोहड़ी 2026: पंजाब-हरियाणा में खुशियों की दस्तक, फसलों के त्योहार पर लोक गीतों की धूम

आज उत्तर भारत के अधिकांश हिस्सों, विशेष रूप से पंजाब, हरियाणा और दिल्ली में लोहड़ी का पर्व बड़े ही धूमधाम से मनाया जा रहा है। यह त्योहार मुख्य रूप से रबी की फसलों की कटाई और नई फसल के घर आने की खुशी में मनाया जाता है। किसान समुदाय इस दिन अपनी अच्छी उपज के लिए अग्नि देव और सूर्य देव के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हैं। शाम के समय मोहल्लों और घरों के आंगन में पवित्र ‘लोहड़ी की आग’ जलाई जाती है, जिसमें तिल, गुड़, गजक, रेवड़ी और मूंगफली अर्पित की जाती है। लोग आग के चारों ओर परिक्रमा करते हुए अपनी सुख-समृद्धि की कामना करते हैं और “ईश्वर आए, दरिद्र जाए” के पारंपरिक मंत्रों का उच्चारण करते हैं।

लोहड़ी का त्योहार आपसी भाईचारे और सांस्कृतिक एकता का प्रतीक है। इस अवसर पर लोक नायक ‘दुल्ला भट्टी’ की कहानी बड़े चाव से सुनाई जाती है, जिन्होंने मुगल काल के दौरान गरीब लड़कियों की रक्षा की थी। पंजाब और हरियाणा के गांवों में ‘सुंदर मुंदरिये’ जैसे लोक गीत गूंज रहे हैं और पुरुष ‘भांगड़ा’ व महिलाएं ‘गिद्धा’ नृत्य कर अपनी खुशी साझा कर रही हैं। जिस घर में नई शादी हुई हो या पहले बच्चे का जन्म हुआ हो, वहाँ लोहड़ी का जश्न और भी भव्य होता है। रिश्तेदारों और पड़ोसियों को भोजन पर आमंत्रित किया जाता है, जहाँ पारंपरिक सरसों का साग और मक्के की रोटी मुख्य आकर्षण होते हैं।

डिजिटल युग में भी लोहड़ी का महत्व कम नहीं हुआ है, बल्कि अब लोग सोशल मीडिया के माध्यम से दूर बैठे अपनों को शुभकामनाएं भेज रहे हैं। बाजारों में सुबह से ही काफी रौनक देखी गई, जहाँ मूंगफली और गुड़ की बनी मिठाइयों की जमकर खरीदारी हुई। प्रधानमंत्री और विभिन्न राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने भी देशवासियों को लोहड़ी की बधाई देते हुए सभी के जीवन में मिठास और प्रगति की कामना की है। जैसे-जैसे रात ढलती है, आग की लपटों के साथ हंसी-ठिठोली और ढोल की थाप और तेज हो जाती है। यह पर्व हमें प्रकृति से जुड़े रहने और मिल-जुलकर खुशियां बांटने का संदेश देता है, जो भारतीय संस्कृति की मूल पहचान है।

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