भारत-यूरोपीय संघ (EU) के बीच ऐतिहासिक ‘मदर ऑफ ऑल डील्स’

भारत और यूरोपीय संघ के बीच प्रस्तावित मुक्त व्यापार समझौता अपने अंतिम चरण में है, जिसे विशेषज्ञ व्यापारिक जगत की सबसे बड़ी संधि (Mother of All Deals) मान रहे हैं। इस समझौते का मुख्य उद्देश्य 27 यूरोपीय देशों और भारत के बीच व्यापारिक बाधाओं और टैरिफ (सीमा शुल्क) को पूरी तरह समाप्त या न्यूनतम करना है। वर्तमान में भारत और EU के बीच द्विपक्षीय व्यापार करीब $130 बिलियन से अधिक है, जिसे इस संधि के माध्यम से अगले पांच वर्षों में $250 बिलियन तक पहुँचाने का लक्ष्य रखा गया है। यह समझौता न केवल माल के आदान-प्रदान, बल्कि सेवाओं, डिजिटल व्यापार और निवेश संरक्षण पर भी केंद्रित है, जो इसे अब तक का सबसे व्यापक आर्थिक समझौता बनाता है।
इस डील से भारतीय कपड़ा, कृषि उत्पाद, जूते और फार्मास्यूटिकल्स उद्योग को यूरोपीय बाजारों में ‘जीरो-ड्यूटी’ एक्सेस मिलेगा, जिससे भारतीय निर्यात में भारी उछाल आने की उम्मीद है। वहीं, यूरोपीय देशों को भारत के विशाल ऑटोमोबाइल, वाइन, और हाई-टेक मशीनरी बाजार में बेहतर पहुंच प्राप्त होगी। समझौते का एक महत्वपूर्ण हिस्सा ‘लेबर स्टैंडर्ड्स’ और ‘सस्टेनेबिलिटी’ क्लॉज है, जिस पर दोनों पक्ष अब एक सहमति पर पहुँच गए हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यह संधि चीन पर वैश्विक निर्भरता को कम करने (De-risking) की दिशा में एक बड़ा कदम है, क्योंकि यूरोपीय कंपनियां अब भारत को अपने प्राथमिक ‘सप्लाई चेन हब’ के रूप में देख रही हैं।
तकनीकी रूप से, यह समझौता ‘भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारे’ (IMEC) को एक नई ऊर्जा प्रदान करेगा। ‘मदर ऑफ ऑल डील्स’ के तहत डेटा सुरक्षा और बौद्धिक संपदा अधिकारों (IPR) पर भी सख्त नियम बनाए गए हैं, जिससे यूरोपीय आईटी और रिसर्च कंपनियां भारत में अपने केंद्र स्थापित करने के लिए प्रोत्साहित होंगी। यह समझौता केवल व्यापार तक सीमित नहीं है, बल्कि यह हिंद-प्रशांत क्षेत्र में एक नई रणनीतिक धुरी तैयार करेगा। यदि यह समझौता पूर्ण रूप से लागू होता है, तो यह भारत की GDP में सालाना 1.5% से 2% तक की अतिरिक्त वृद्धि कर सकता है। वैश्विक मंदी के दौर में यह डील भारत को ‘विश्व की विकास इंजन’ के रूप में स्थापित करने में मील का पत्थर साबित होगी।



