
आज ‘राष्ट्रीय युवा दिवस’ के अवसर पर जहाँ देश स्वामी विवेकानंद के आदर्शों को याद कर रहा है, वहीं स्वास्थ्य विशेषज्ञों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने एक डरावना आंकड़ा साझा किया है। नवीनतम रिपोर्टों के अनुसार, भारत में लगभग 1.6 करोड़ युवा वर्तमान में किसी न किसी गंभीर नशे की लत (Substance Abuse) के शिकार हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि नशा केवल एक स्वास्थ्य समस्या नहीं, बल्कि एक सामाजिक महामारी बन चुका है जो देश की ‘डेमोग्राफिक डिविडेंड’ (जनसांख्यिकीय लाभांश) को नष्ट कर रहा है। शराब, सिंथेटिक ड्रग्स और नशीली दवाओं के बढ़ते चलन ने शहरी और ग्रामीण दोनों क्षेत्रों के युवाओं को अपनी चपेट में ले लिया है, जिससे उनकी शिक्षा, करियर और मानसिक स्वास्थ्य पर विनाशकारी प्रभाव पड़ रहा है।
नशे की इस बढ़ती लत के पीछे कई मनोवैज्ञानिक और सामाजिक कारण जिम्मेदार हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, शैक्षणिक दबाव, बेरोजगारी, अकेलेपन की भावना और सोशल मीडिया पर दिखाई जाने वाली भ्रामक ‘ग्लेमरस’ जीवनशैली युवाओं को इस दलदल में धकेल रही है। विशेष रूप से 15 से 25 वर्ष की आयु के किशोर पीयर प्रेशर (साथियों का दबाव) के कारण प्रयोग के तौर पर नशा शुरू करते हैं, जो बाद में एक घातक निर्भरता बन जाती है। मनोचिकित्सकों ने चेतावनी दी है कि नशे के कारण युवाओं में अवसाद, चिंता और हिंसक प्रवृत्तियां बढ़ रही हैं, जो सीधे तौर पर समाज में अपराध दर में वृद्धि और पारिवारिक बिखराव का कारण बन रही हैं।
इस संकट से निपटने के लिए विशेषज्ञों ने ‘राष्ट्रीय युवा दिवस’ पर “नशा मुक्त भारत” के संकल्प को और अधिक प्रभावी ढंग से लागू करने की अपील की है। उन्होंने सुझाव दिया है कि केवल कानून के माध्यम से नहीं, बल्कि स्कूलों और कॉलेजों में व्यापक जागरूकता अभियानों और मानसिक स्वास्थ्य परामर्श (Counseling) के जरिए इसे रोका जा सकता है। सरकार को पुनर्वास केंद्रों (Rehab Centers) की गुणवत्ता सुधारने और ड्रग पेडलर्स के खिलाफ सख्त कार्रवाई करने की जरूरत है। यदि समय रहते युवा पीढ़ी को नशे के इस जाल से बाहर नहीं निकाला गया, तो विकसित भारत का सपना केवल कागजों तक सीमित रह जाएगा। युवाओं को रचनात्मकता और खेलों की ओर मोड़ना ही इस समस्या का एकमात्र स्थाई समाधान है।



