पड़ोसी देश में हलचल: बांग्लादेश में ऐतिहासिक मतदान

लोकतंत्र की नई शुरुआत और चुनावी परिदृश्य बांग्लादेश के इतिहास में यह पहला मौका है जब 15 साल के लंबे एकतरफा शासन के अंत के बाद जनता अपने मताधिकार का प्रयोग कर रही है। आज सुबह 7:30 बजे से 299 सीटों पर मतदान शुरू हुआ, जिसमें करीब 12.7 करोड़ मतदाता भाग ले रहे हैं। इस चुनाव की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना की पार्टी ‘आवामी लीग’ इसमें शामिल नहीं है, क्योंकि उसकी राजनीतिक गतिविधियों पर प्रतिबंध लगा दिया गया है। मुख्य मुकाबला तारिक रहमान की ‘बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी’ (BNP) और ‘जमात-ए-इस्लामी’ समर्थित 11-दलीय गठबंधन के बीच माना जा रहा है। नोबेल पुरस्कार विजेता मोहम्मद यूनुस की अंतरिम सरकार की देखरेख में हो रहे इन चुनावों को देश के लोकतांत्रिक पुनर्जन्म के रूप में देखा जा रहा है।
युवा वोटर्स और प्रमुख चुनावी मुद्दे इस चुनाव का भविष्य काफी हद तक बांग्लादेश की ‘जेन-जी’ (Gen Z) पीढ़ी के हाथों में है, जो कुल मतदाताओं का लगभग 44 प्रतिशत हिस्सा हैं। पहली बार वोट डाल रहे करीब 50 लाख युवा मतदाताओं के लिए विचारधारा से ज्यादा सुशासन, रोजगार और भ्रष्टाचार मुक्त प्रशासन जैसे मुद्दे प्राथमिकता पर हैं। देश में महंगाई दर (जनवरी में 8.58%) और आर्थिक मंदी एक बड़ी चुनौती बनी हुई है, जिसके कारण जनता विकास के वादों पर अधिक भरोसा कर रही है। इसके साथ ही, संवैधानिक सुधारों के लिए हो रहा जनमत संग्रह यह तय करेगा कि भविष्य में सत्ता का संतुलन कैसे बनाया जाए और किसी भी व्यक्ति के प्रधानमंत्री रहने की समय सीमा 10 साल तय की जाए या नहीं।
सुरक्षा चुनौतियां और भारत पर प्रभाव शांतिपूर्ण मतदान सुनिश्चित करने के लिए देशभर में नौ लाख से अधिक सुरक्षाकर्मी तैनात किए गए हैं, हालांकि गोपालगंज जैसे कुछ इलाकों में हिंसा की छिटपुट खबरें भी आई हैं। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर, विशेषकर भारत के लिए, यह चुनाव सामरिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण है। पिछले कुछ महीनों में बांग्लादेश में बढ़ी ‘भारत-विरोधी’ बयानबाजी और अल्पसंख्यकों की सुरक्षा को लेकर नई दिल्ली की चिंताएं बढ़ी हैं। चुनाव के नतीजे यह तय करेंगे कि आने वाले समय में दक्षिण एशिया का पावर बैलेंस कैसा होगा—क्या बांग्लादेश अपने पुराने सहयोगी भारत के करीब रहेगा या उसका झुकाव चीन और पाकिस्तान की ओर बढ़ेगा।



